क्यों  खुशियाँ  अपनी सी और गम पराये से लगते है. 
खुशियाँ  अक्सर  दरवाजे पर दस्तक दिए चली जाती है. 
और गम बिना बुलाये  हमसे मिलने चले आते है | 


हमने तो बेवजाह इन गमों को कोसा है
जबकि इन ग़मों  ने हमें खुशियों की  
अहमियत को समझाया है |




कई बार खुशियाँ एक ख़्वाब सी लगती हैं 
जिसके पूरा होने की ख्वाहिश हर वक्त 
दिल को सताती रहती है......

और जब यही ख़्वाब  टूट कर बिखरते है 
तो ऐसा लगता है कि किसी ने बेशक़ीमती 
माला के खूबसूरत मोतियों को बेरहमी 
के साथ जमीन पर बिखेर दिया हो.... 

फिर भी ये खुशियाँ क्यों अपनी सी 
और गम पराये से लगते है. |